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मिशिगन के उम्मीदवार अशोक बड्डी ने खुद को बताया 'कम्युनिटी फ्रैंड'

बड्डी ने डेमोक्रेटिक पार्टी छोड़कर रिपब्लिकन पार्टी में जाने के अपने फैसले पर भी बात की। उन्होंने कहा कि मैं बदलाव लाने के लिए चुनाव लड़ रहा हूं।

अशोक बड्डी / IANS

मिशिगन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के लिए चुनाव लड़ रहे भारतीय अमेरिकी समुदाय नेता अशोक बड्डी ने अपने समर्थकों से कहा कि वह खुद को 'समुदाय का दोस्त' बनाना चाहते हैं। उन्होंने यह बात एक चुनावी कार्यक्रम के दौरान कही।

डेमोक्रेट से रिपब्लिकन बने बड्डी एक सामुदायिक नेता और छोटे व्यवसाय के मालिक हैं। उनके पास दो दशकों से अधिक का सामाजिक और धार्मिक सेवा का अनुभव है। वह मिनुटमैन प्रेस रोचेस्टर हिल्स के मालिक हैं और एक स्थानीय हिंदू मंदिर के बोर्ड सदस्य भी हैं।

100 से अधिक लोगों की मौजूदगी में उन्होंने अपनी चुनावी सोच को रखते हुए कहा कि मैं चाहता हूं कि लोग मुझे समुदाय के दोस्त के रूप में जानें। यही मेरी इच्छा है। उन्होंने आगे कहा कि मैं चाहता हूं कि लोग मुझे इस तरह याद रखें कि उन्होंने किसी न किसी तरीके से मेरी मदद की। मुझे लगता है कि यही मेरे जीवन की पहचान होगी।

बड्डी ने डेमोक्रेटिक पार्टी छोड़कर रिपब्लिकन पार्टी में जाने के अपने फैसले पर भी बात की। उन्होंने कहा कि मैं बदलाव लाने के लिए चुनाव लड़ रहा हूं। मुझे लगता है कि मैंने सही फैसला लिया है। मैंने यह तब किया जब मैंने राष्ट्रपति ट्रंप को वोट दिया और जब मैंने सानी रेड्डी को वोट दिया। यह सब तब हुआ जब मैं डेमोक्रेटिक पार्टी कांग्रेस का चेयरपर्सन था। 

अपने अभियान की वेबसाइट पर उन्होंने खुद को ऐसा डेमोक्रेट बताया है जो अंधी पक्षपातपूर्ण राजनीति से निराश होकर पार्टी छोड़ चुका है और मानता है कि पार्टी के प्रति निष्ठा देश और समुदाय से ऊपर नहीं होनी चाहिए।

आव्रजन के मुद्दे पर बड्डी ने संतुलित रुख अपनाया है। उन्होंने कहा कि वह आव्रजन के समर्थक हैं, लेकिन नियम आधारित प्रणाली जरूरी है। उन्होंने कहा कि हम इस देश में आए क्योंकि यह यहां भरपूर अवसर मिलते हैं। शायद दुनिया में कोई और देश नहीं है जहां कानूनी आव्रजन के लिए इतना खुला माहौल हो। उन्होंने आगे कहा कि वह कानूनी आव्रजन के पक्ष में हैं और नियमों का पालन करना सभी से अपेक्षित होना चाहिए।

अपने संबोधन में बड्डी ने अपने राजनीतिक मार्गदर्शकों, नेताओं और परिवार का आभार व्यक्त किया। उन्होंने अपनी पत्नी डॉ. पूर्णिमा, बेटों अनिरुद्ध और विधव, तथा बेटी संजीवनी का विशेष रूप से धन्यवाद किया और बताया कि उनके राजनीतिक जीवन का उनके परिवार पर भी प्रभाव पड़ा है। उन्होंने अपने अभियान के लिए धन की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि सही काम करने के लिए भी संसाधन जरूरी होते हैं और एक संस्कृत कहावत का उल्लेख किया।

उन्होंने कहा कि अगर हमारे पास धन नहीं है तो हम सही और गलत की बात भी नहीं कर सकते क्योंकि जो व्यक्ति भूखा है, वह इन बातों को नहीं समझ पाएगा।

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