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किंग चार्ल्स III ने रानी कैमिला संग लंदन के नीस्डन मंदिर में की पूजा-अर्चना

BAPS श्री स्वामीनारायण मंदिर, जिसे आमतौर पर नीस्डन मंदिर के नाम से जाना जाता है। मंदिर समिति ने शाही मेहमानों का फूलों की माला और पारंपरिक स्वागत विधियों से अभिनंदन किया।

किंग चार्ल्स III और रानी कैमिला / The Royal Family via X

ब्रिटेन के सम्राट राजा चार्ल्स तृतीय और रानी कैमिला ने 29 अक्टूबर को लंदन स्थित प्रसिद्ध नीस्डन मंदिर का दौरा किया। यह यात्रा मंदिर की 30वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में की गई, जहां शाही जोड़े ने पूजा-अर्चना और आध्यात्मिक कार्यक्रमों में भाग लिया।

ब्रिटिश शाही परिवार के आधिकारिक X (Twitter) अकाउंट से जारी संदेश में कहा गया, 'आज राजा और रानी ने यूरोप के पहले पारंपरिक हिंदू पत्थर मंदिर का दौरा किया।'

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BAPS श्री स्वामीनारायण मंदिर, जिसे आमतौर पर नीस्डन मंदिर के नाम से जाना जाता है। मंदिर समिति ने शाही मेहमानों का फूलों की माला और पारंपरिक स्वागत विधियों से अभिनंदन किया। 76 वर्षीय सम्राट राजा चार्ल्स का स्वागत मुख्य पुजारी साधु योगविवेकदास स्वामी ने पारंपरिक ‘नाड़ाचड़ी’ (पवित्र धागा बांधने की रस्म) के माध्यम से किया, जो शांति और मित्रता के बंधन का प्रतीक है।



यह राजा चार्ल्स का नीस्डन मंदिर का चौथा दौरा था। इससे पहले वे 1996, 2001 और 2009 में यहां आ चुके हैं। 1996 में वे प्रिंस ऑफ वेल्स के रूप में मंदिर आए थे, जबकि यह उनकी राजगद्दी संभालने के बाद पहली आधिकारिक यात्रा रही।

मंदिर प्रशासन ने अपने आधिकारिक बयान में कहा, 'राजा चार्ल्स तृतीय और रानी कैमिला को हमारे मंदिर में 30वीं वर्षगांठ के अवसर पर पाकर हम सम्मानित महसूस कर रहे हैं। आपकी उपस्थिति ने इस समारोह को और भी विशेष और यादगार बना दिया।'



शाही जोड़े ने मंदिर में मौजूद भक्तों और स्वयंसेवकों से मुलाकात की, और मंदिर द्वारा संचालित समुदाय व सामाजिक सेवा परियोजनाओं के बारे में जानकारी ली। उन्होंने 'द फेलिक्स प्रोजेक्ट' और 'वीमेन ऑफ द वर्ल्ड' जैसी पहलों से जुड़े प्रतिनिधियों से भी बातचीत की। राजा चार्ल्स और रानी कैमिला ने इस दौरान फ्रांस के पेरिस में बन रहे नए BAPS हिंदू मंदिर के मॉडल को भी देखा और इस परियोजना से जुड़े विशेषज्ञों से मुलाकात की।

नीस्डन मंदिर यूरोप का पहला पारंपरिक हिंदू पत्थर मंदिर है, जिसका उद्घाटन 1995 में प्रपूज्य प्रमुख स्वामी महाराज ने किया था। यह मंदिर 26,000 हाथों से तराशे गए बुल्गारियाई चूना पत्थर और इतालवी संगमरमर से बना है, और इसमें स्टील का उपयोग नहीं किया गया है।



यह मंदिर न केवल पूजा-अर्चना का केंद्र है, बल्कि एक संस्कृतिक व शैक्षणिक स्थल भी है, जहां 'अंडरस्टैंडिंग हिंदुइज़्म' प्रदर्शनी लगाई जाती है। हर साल यहां करीब पांच लाख श्रद्धालु और पर्यटक दर्शन करने आते हैं।

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