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2026 पॉल और डेजी सोरोस फेलोशिप में भारतीय-अमेरिकी छात्रों का दबदबा

विजेता 17 स्नातक संस्थानों और 16 स्नातकोत्तर कार्यक्रमों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये छात्र परमाणु विज्ञान, कम्प्यूटेशनल केमिस्ट्री, संज्ञानात्मक विज्ञान, जैव-अभियांत्रिकी, विद्युत अभियांत्रिकी, जातीय अध्ययन, नाटक लेखन और पत्रकारिता जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में पढ़ाई कर रहे हैं।

अखिल राजन, अक्षय विजया अन्नप्रगदा, अनंतन सदगोपन, आर्य राव, अविनाश वडाली और इलिना लोगानी / Paul & Daisy Soros Fellowship

भारतीय-अमेरिकी छात्रों ने 2026 की पॉल और डेजी सोरोस फेलोशिप में शानदार सफलता हासिल की है। इस वर्ष चुने गए फेलोज में एक-तिहाई से अधिक छात्र भारतीय मूल के हैं। हाल ही में घोषित 30 फेलोज में से 11 भारतीय-अमेरिकी हैं। फेलोशिप बोर्ड ने इसे 28 साल के इतिहास की सबसे कठिन चयन प्रक्रिया बताया है। इस बार 3,000 से अधिक आवेदन आए, जो अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है।

विजेता 17 स्नातक संस्थानों और 16 स्नातकोत्तर कार्यक्रमों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये छात्र परमाणु विज्ञान, कम्प्यूटेशनल केमिस्ट्री, संज्ञानात्मक विज्ञान, जैव-अभियांत्रिकी, विद्युत अभियांत्रिकी, जातीय अध्ययन, नाटक लेखन और पत्रकारिता जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में पढ़ाई कर रहे हैं। फेलोशिप के तहत छात्रों को अपनी उच्च शिक्षा के लिए 90,000 डॉलर तक की सहायता दी जाती है।

इसके साथ ही वे पिछले फेलोज के एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा बनते हैं, जिसमें अमेरिका के सर्जन जनरल विवेक मूर्ति, उपन्यासकार संजना सथियन और वेंचर कैपिटलिस्ट राज शाह जैसे नाम शामिल हैं।

सूची में पहला नाम अखिल राजन का है। उनका जन्म शिकागो में भारतीय मूल के माता-पिता के घर हुआ था। उनका बचपन अमेरिका के कई शहरों में बीता और कुछ साल उन्होंने भारत में भी बिताए। उन्हें 2026 की फेलोशिप येल विश्वविद्यालय में कानून में जेड़ी और राजनीति विज्ञान में पीएचडी की पढ़ाई के लिए दी गई है।

अक्षया विजया अन्नप्रगडा को भी 2026 फेलोशिप मिली है। उन्हें जॉन्स हॉपकिन्स विश्वविद्यालय में एमडी और बायोमेडिकल इंजीनियरिंग में पीएचडी करने के लिए यह सहायता दी गई है। उनका जन्म कैलिफोर्निया के फ्रीमोंट में हुआ। उनके माता-पिता 1980 के दशक में भारत से अमेरिका आए थे। उन्होंने हार्वर्ड से एप्लाइड मैथेमेटिक्स में उच्च सम्मान के साथ डिग्री और इंजीनियरिंग साइंसेज़ में मास्टर डिग्री हासिल की।

अनंतन सदागोपन को हार्वर्ड विश्वविद्यालय में बायोलॉजिकल और बायोमेडिकल साइंसेज में पीएचडी के लिए फेलोशिप मिली है। वे मैसाचुसेट्स के वेस्टबरो में चेन्नई से आए प्रवासी माता-पिता के घर पले-बढ़े। उन्होंने मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से केवल तीन साल में केमिस्ट्री और बायोलॉजी में स्नातक की डिग्री पूरी की।

आर्या राव भी इस सूची में शामिल हैं। वे भारत से आए कोंकणी प्रवासी परिवार की बेटी हैं। उन्हें हार्वर्ड विश्वविद्यालय में एमडी और बायोइन्फॉर्मेटिक्स तथा इंटीग्रेटिव जीनोमिक्स में पीएचडी के लिए फेलोशिप दी गई है। आर्या को 16 साल की उम्र में कोलंबिया विश्वविद्यालय में प्रवेश मिला था। उन्होंने 2022 में बायोकेमिस्ट्री और कंप्यूटर साइंस में डिग्री पूरी की।

अविनाश वडाली को भी यह फेलोशिप मिली है। वे मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में भौतिकी में पीएचडी कर रहे हैं। उनका जन्म और पालन-पोषण शिकागो में हुआ। उन्होंने कैलटेक से भौतिकी में स्नातक किया। डेट्रॉइट में जन्मी इलिना लोगानी भी इस सूची में हैं। उनके माता-पिता नई दिल्ली से अमेरिका आए थे। उन्हें स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में कानून की पढ़ाई के लिए फेलोशिप मिली है। उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में उच्च सम्मान के साथ पढ़ाई पूरी की।

रिया दास भी इस फेलोशिप की विजेता हैं। वे मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग और कंप्यूटर साइंस में पीएचडी कर रही हैं। यह फेलोशिप उनकी पढ़ाई में सहायता करेगी। एमआईटी की एक और छात्रा रोनक देसाई को भी यह सम्मान मिला है। वे हार्वर्ड विश्वविद्यालय में एमडी और मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में केमिस्ट्री में पीएचडी कर रही हैं।

कोलोराडो स्प्रिंग्स की रहने वाली सेरीन सिंह को भी पॉल और डेजी सोरोस फेलोशिप दी गई है। पंजाबी प्रवासी माता-पिता की बेटी सेरीन कानून में जेड़ी करना चाहती हैं।

भारतीय-अमेरिकी विवस्वान व्यकुंटा भी इस सूची में शामिल हैं। वे आंध्र प्रदेश से आए प्रवासी परिवार के बेटे हैं। उन्हें कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सैन फ्रांसिस्को में एमडी और बायोमेडिकल साइंसेज़ में पीएचडी के लिए फेलोशिप मिली है।

यासा बैग भी इस फेलोशिप के विजेताओं में शामिल हैं। वे स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में बायोइंजीनियरिंग में पीएचडी कर रही हैं। उनका जन्म भारत के आगरा में हुआ था और जब वे एक वर्ष की थीं, तब उनका परिवार अमेरिका चला गया। वे वर्तमान में स्टैनफोर्ड में बायोइंजीनियरिंग में शोध कर रही हैं।

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