पाक सेना प्रमुख आसिम मुनीर और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प। / Reuters/file
पाकिस्तान हमेशा से ही भारत के खिलाफ आतंकवाद की फंडिंग करता रहा है। एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को लेकर अमेरिका के ज्यादा ध्यान नहीं देने की वजह से भारत निराश है। पाकिस्तान की ओर से पोषित आतंकवाद भारत की सुरक्षा के लिए गहरी चिंता का विषय है।
ऐसे में इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अमेरिका को कश्मीर को लेकर भारत के स्पष्ट रुख का सम्मान करना चाहिए। इसके साथ ही इस मुद्दे पर अमेरिका को किसी भी तरह के तीसरे पक्ष की मध्यस्थता से बचना चाहिए।
थिंक टैंक सेंटर फॉर ए न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी के इस हफ्ते जारी एक पॉलिसी पेपर में चेतावनी दी गई है कि जरूरी सेक्टर में लगातार सहयोग के बावजूद, अमेरिका और भारत के बीच संबंधों पर गहरा रणनीतिक अविश्वास छाया हुआ है।
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रिपोर्ट, 'रिपेयरिंग द ब्रीच: गेटिंग अमेरिका-भात टाईज बैक ऑन ट्रैक', में कहा गया है कि 2025 में शुरू हुआ तनाव पूरी तरह से कम नहीं हुआ है और इसे ठीक होने में समय लगेगा।
लिसा कर्टिस, कीर्ति मार्टिन और सितारा गुप्ता की लिखी इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 2025 में दोनों देशों के बीच के संबंध पर बुरा असर देखने को मिला। रिपोर्ट में भारत और पाकिस्तान के बीच सीजफायर कैसे हुआ और भारतीय एक्सपोर्ट पर अमेरिका के भारी टैरिफ लगाने पर मतभेदों का जिक्र किया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, फरवरी 2026 में एक अंतरिम ट्रेड डील का फ्रेमवर्क "दोनों देशों को रिश्ते वापस पटरी पर लाने का मौका" देता है, लेकिन भरोसा फिर से बनाने के लिए लगातार कोशिश करनी होगी।
रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि आर्थिक, रक्षा और तकनीक संबंध काफी हद तक बने हुए हैं, लेकिन पाकिस्तान और आतंकवाद को लेकर मतभेद बुनियादी बने हुए हैं।
इसमें कहा गया है कि नई दिल्ली इस बात से निराश है कि वाशिंगटन द्वारा द रेजिस्टेंस फ्रंट को आतंकवादी समूह घोषित करने के बाद भी पाकिस्तान से होने वाले आतंकवाद पर अमेरिका का ध्यान काफी नहीं है।
भारत हमेशा से ही कश्मीर के मामले में किसी भी दूसरे देशों के हस्तक्षेप को खारिज करता रहा है। रिपोर्ट में कश्मीर के मुद्दे पर किसी भी बाहरी दखल के भारत के लंबे समय से चले आ रहे विरोध का भी जिक्र किया गया है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि मध्यस्थता का सुझाव देने वाले अमेरिकी बयानों से दोनों देशों के बीच भरोसे को और नुकसान पहुंचने का खतरा है।
रिपोर्ट में संबंध ठीक करने के लिए सलाह दी गई है कि अमेरिका कश्मीर मुद्दे पर भारत-पाकिस्तान विवाद में बीच-बचाव करने की बात करने से बचे और इसके बजाय उन क्षेत्रों पर ध्यान दे जहां तालमेल बैठ सकती है।
हालांकि, रिपोर्ट डिफेंस कोऑपरेशन में लगातार तेजी की ओर इशारा करती है। बता दें, भारत और अमेरिका ने पिछले साल 10 साल के रक्षा फ्रेमवर्क सझौते को आगे बढ़ाया है। इसमें इंटेलिजेंस शेयरिंग, मैरीटाइम सिक्योरिटी और रक्षा तकनीक सहयोग शामिल हैं।
बीते साल अमेरिका और भारत के बीच टैरिफ को लेकर भी भारी तनाव देखने को मिला। हालांकि, दोनों देशों के बीच जो अंतरिम व्यापार समझौता हुआ, उसमें टैरिफ घटा दिया गया। इसे देखते हुए रिपोर्ट में आर्थिक एंगेजमेंट में भी रिकवरी के संकेत दिए गए। इसमें खास क्षेत्र में ट्रेड बढ़ाने की प्रतिबद्धता शामिल हैं।
रिपोर्ट में एनर्जी, जरूरी मिनरल्स, फार्मास्यूटिकल्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सेमीकंडक्टर जैसी एडवांस्ड टेक्नोलॉजी को गहरे सहयोग के लिए जरूरी क्षेत्र के तौर पर पहचाना गया है। इसमें कहा गया है कि न्यूक्लियर एनर्जी में भारत के सुधार और जरूरी मिनरल्स में निवेश उसे मजबूत सप्लाई चेन बनाने में एक संभावित पार्टनर बनाते हैं, खासकर इसलिए क्योंकि दोनों देश चीन पर निर्भरता कम करना चाहते हैं।
साथ ही, भारत के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और डेटा सेंटर्स में अमेरिका के निवेश को लंबे समय तक एक-दूसरे पर तकनीकी निर्भरता को मजबूत करने के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि जब तक राजनीतिक अविश्वास को दूर नहीं किया जाता, ये फायदे कम हो सकते हैं।
इसमें काउंटरटेररिज्म कोऑपरेशन पर नए सिरे से फोकस करने की बात कही गई है, जिसमें टेरर फाइनेंसिंग को रोकने और ग्लोबल फोरम पर कोऑर्डिनेशन को मजबूत करने की कोशिशें शामिल हैं।
रिपोर्ट का सार यह है कि भारत हिंद-प्रशांत को बनाने में "महत्वपूर्ण भूमिका" निभाएगा और अमेरिका-भारत संबंधों का रास्ता क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को तय करने में महत्वपूर्ण होगा।
इसमें यह भी कहा गया है कि साझेदारी की गुणवत्ता इस बात पर असर डालेगी कि क्षेत्र में शक्ति संतुलन है या नहीं या चीन प्रमुख ताकत बनने में सफल होता है या नहीं।
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