सांकेतिक छवि... / Courtesy: AI-generated
नेटवर्क कंटैजियन रिसर्च इंस्टीट्यूट के एक नए अध्ययन के अनुसार, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर भारत-विरोधी सामग्री में वर्ष 2025 में तीव्र वृद्धि हुई, जिसकी मात्रा लगभग तीन गुना हो गई।
'नीतिगत विचलन से शुद्धतावादी धोखाधड़ी तक: कैसे एक छोटे नेटवर्क ने आप्रवासन बहस को हाईजैक किया' शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में पाया गया कि 24,000 से अधिक पोस्ट भारतीयों को लक्षित करते हुए थे, जिन्हें 30 करोड़ से अधिक बार देखा गया।
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विश्लेषण से पता चला कि आप्रवासन नीतियों से संबंधित घोषणाएं, जैसे कि H-1B वीजा नियमों में अपडेट और नए वीजा प्रतिबंध, अक्सर ऑनलाइन ऐसी भाषा के उपयोग में तीव्र वृद्धि का कारण बनते हैं जो भारतीयों को आर्थिक 'प्रतिस्थापनकर्ता' या जनसांख्यिकीय 'आक्रमणकारी' के रूप में चित्रित करती हैं।
रिपोर्ट में पाया गया कि आप्रवासन के बारे में ऑनलाइन बातचीत अक्सर वैध नीतिगत आलोचना से हटकर जातीय बलि का बकरा बनाने में बदल जाती थी। H-1B वीजा जैसे कार्यक्रमों पर चर्चा अक्सर इस व्यापक दावे में बदल जाती थी कि भारतीय व्यवस्था का दुरुपयोग कर रहे हैं या अमेरिकी श्रमिकों से नौकरियां छीन रहे हैं, जिससे रूढ़िवादिता और नस्लवादी अभिव्यक्तियों को बल मिलता है।
रिपोर्ट के अनुसार, कुछ विशेष नीतिगत बदलावों के चलते भारत-विरोधी बयानबाजी में तेजी आई। जनवरी 2025 में गृह सुरक्षा विभाग (DHS) द्वारा H-1B वीजा के कार्यान्वयन पर जारी 'आधुनिकीकरण' नियम और मई में विदेश विभाग द्वारा कुछ भारत-आधारित ट्रैवल एजेंसियों के लिए वीज़ा सीमित करने के निर्णय, दोनों के चलते भारत-विरोधी पोस्टों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई।
सबसे बड़ी उछाल सितंबर 2025 में तब आई जब व्हाइट हाउस ने नए एच-1बी आवेदन दाखिल करने वाले नियोक्ताओं पर अस्थायी रूप से 100,000 अमेरिकी डॉलर का शुल्क लगाने की घोषणा की। कई सक्रिय पोस्टों में इस नीति का समर्थन किया गया, लेकिन साथ ही भारतीयों के प्रति अपमानजनक टिप्पणियां, रूढ़िवादिता, अमानवीय शब्द और निर्वासन की मांग भी की गई।
शोध से यह भी पता चला कि इस तरह की सामग्री का प्रसार व्यापक जनमानस के बजाय कुछ सीमित खातों द्वारा ही हुआ था। डेटासेट में भारत-विरोधी सामग्री से जुड़े सभी लाइक्स में से 10 प्रतिशत से अधिक और रीट्वीट्स में से लगभग 20 प्रतिशत केवल तीन बेहद सक्रिय उपयोगकर्ताओं के थे।
भारतीय-अमेरिकी राजनेताओं और प्रमुख हस्तियों को भी बार-बार निशाना बनाया गया। डेटा में शामिल पोस्ट और रिप्लाई में अक्सर उद्यमी और पूर्व राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार विवेक रामास्वामी, सांसद श्री थानेदार और सांसद प्रमिला जयपाल जैसी हस्तियों का जिक्र होता था, जिनमें आप्रवासन की आलोचना को जातीय द्वेष के साथ मिलाया गया था।
रिपोर्ट में 2025 के अंत में उपराष्ट्रपति जे.डी. वैंस की पत्नी उषा वैंस पर हुए हमलों की एक अलग श्रृंखला का भी उल्लेख किया गया है, जब धुर दक्षिणपंथी हस्तियों ने उनकी भारतीय विरासत के कारण उन पर नस्लीय अपमानजनक टिप्पणियां कीं।
वर्ष के दौरान, भारत-विरोधी विषयों की शैली में बदलाव आया। शुरुआती सामग्री में खुले तौर पर अपमानजनक टिप्पणियां थीं, जबकि बाद की सामग्री में आप्रवासन या रोजगार बाजार से संबंधित नीतिगत शब्दावली का इस्तेमाल किया गया, फिर भी उसमें वही अंतर्निहित पूर्वाग्रह झलकता रहा। रिपोर्ट में बताया गया कि इस बदलाव ने ऐसी पोस्टों को व्यापक पहुंच हासिल करने और सामग्री मॉडरेशन से बचने में मदद की।
विश्लेषकों ने आगे कहा कि खातों के एक छोटे नेटवर्क द्वारा भारी मात्रा में प्रचार-प्रसार से पता चलता है कि यह भारत-विरोधी बयानबाजी अक्सर सार्वजनिक विचारों के बजाय समन्वित प्रयासों द्वारा संचालित होती है।
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