1 अप्रैल, 2026 को वाशिंगटन, डी.सी., अमेरिका में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट भवन के बाहर एक प्रदर्शनकारी ने तख्ती पकड़ी हुई है, जबकि दूसरे ने टोपी पहन रखी है जिस पर लिखा है- अप्रवासी अमेरिका को महान बनाते हैं। / REUTERS/Jonathan Ernst
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में स्थानीय समयानुसार बुधवार को राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के जन्मजात नागरिकता समाप्त करने के उनके आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई की। इस दौरान राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप स्वयं कोर्ट में मौजूद रहे। अदालत में छिड़ी इस लंबी बहस के बाद H-1B वीजा और अन्य अस्थायी परमिट पर काम कर रहे भारतीय पेशेवरों के बीच चिंताएं बढ़ा दी हैं।
दरअसल ट्रंप ने अमेरिकी एजेंसियों को यह निर्देश दिया था कि वे अमेरिका में जन्मे बच्चों की नागरिकता को मान्यता न दें, जिनके माता-पिता में से कोई भी अमेरिकी नागरिक या फिर ग्रीन कार्ड धारक नहीं है।
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कोर्ट में सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से बहस करते हुए सॉलिसिटर जनरल जॉन सॉयर ने अदालत को बताया कि 14वें संशोधन के नागरिकता खंड का उद्देश्य कभी सार्वभौमिक रूप से लागू होना नहीं था। यह खंड अस्थायी वीजा धारकों या अवैध अप्रवासियों के बच्चों को नागरिकता प्रदान नहीं करता है। इसके लिए संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रति प्रत्यक्ष और तत्काल निष्ठा की आवश्यकता होती है।
साउर ने अपने तर्क को इतिहास पर आधारित बताते हुए कहा कि अमेरिकी गृहयुद्ध के बाद इस संशोधन को मुख्य रूप से मुक्त दासों और उनके वंशजों को नागरिकता की गारंटी देने के लिए बनाया गया था।
उन्होंने तर्क दिया कि इस गारंटी का मूल आधार निष्ठा थी, जो वैध निवास से जुड़ी थी न कि केवल अमेरिकी धरती पर जन्म होना। अस्थायी वीजा पर रहने वाले लोगों के बच्चे उस कसौटी पर खरे नहीं उतरते।
उन्होंने न्यायाधीशों से कहा कि सभी जन्मों को स्वतः नागरिकता प्रदान करना अमेरिकी नागरिकता के अमूल्य और गहन उपहार का अपमान करता है। जस्टिस सैमुअल एलिटो ने यह सवाल उठाया कि क्या एक सामान्य संवैधानिक नियम को अवैध अप्रवासन जैसी आधुनिक स्थितियों पर लागू किया जा सकता है, जो 1868 में उसी रूप में मौजूद नहीं थीं।
जस्टिस एलेना कागन ने कहा कि प्रशासन का रुख संशोधनवादी प्रतीत होता है। उन्होंने कहा कि एक सदी से अधिक समय से, अदालतों और जनता ने यूनाइटेड स्टेट्स बनाम वोंग किम आर्क के पूर्व उदाहरण के तहत जन्मजात नागरिकता को व्यापक रूप से समझा है।
जस्टिस केतनजी ब्राउन जैक्सन ने सवाल उठाया कि क्या सरकार 'निष्ठा' को उसके सामान्य कानून अर्थ से परे पुनर्परिभाषित कर रही है, यह बताते हुए कि देश में रहने के दौरान अस्थायी आगंतुक भी अमेरिकी कानूनों और सुरक्षा के अधीन होते हैं।
कई न्यायाधीशों ने सवाल उठाया कि ऐसी नीति कैसे काम करेगी। उन्होंने पूछा कि अधिकारी जन्म के समय बच्चे की नागरिकता कैसे निर्धारित करेंगे। उन्होंने यह भी पूछा कि क्या प्रत्येक मामले में माता-पिता की अप्रवास स्थिति की जांच करना आवश्यक होगा। सरकार ने बताया कि यह प्रणाली वस्तुनिष्ठ रूप से सत्यापित आव्रजन आंकड़ों पर निर्भर करेगी। इससे यह पता चलता है कि वीजा की स्थिति यह तय कर सकती है कि कोई बच्चा नागरिक है या नहीं।
वहीं ट्रंप प्रशासन का विरोध कर रहे वकीलों ने कहा कि इस कदम से स्थापित कानून पलट जाएगा। उन्होंने 1898 में यूनाइटेड स्टेट्स बनाम वोंग किम आर्क मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया। इसमें यह स्थापित किया कि अमेरिकी धरती पर जन्म लेने से राजनयिकों के बच्चों जैसे कुछ सीमित अपवादों को छोड़कर माता-पिता की स्थिति की परवाह किए बिना नागरिकता प्राप्त होती है। कानून में बदलाव से अनिश्चितता पैदा हो सकती है। इससे शिक्षा, रोजगार और सरकारी लाभों तक पहुंच प्रभावित हो सकती है।
साउर ने कहा कि प्रशासन की नीति व्यक्तिपरक इरादे के बजाय वस्तुनिष्ठ रूप से सत्यापित अप्रवासन स्थिति पर आधारित होगी और भविष्य में लागू होगी।
इस मामले के व्यापक निहितार्थ हैं, जो संभावित रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रतिवर्ष जन्म लेने वाले हजारों बच्चों को प्रभावित कर सकते हैं और नागरिकता पर कांग्रेस और कार्यकारी शक्ति के दायरे के बारे में संवैधानिक प्रश्न उठाते हैं।
दरअसल 1868 में अनुमोदित 14वें संशोधन में कहा गया है कि संयुक्त राज्य अमेरिका में जन्मे या प्राकृतिक रूप से नागरिकता प्राप्त करने वाले सभी व्यक्ति और जो इसके अधिकार क्षेत्र के अधीन हैं, नागरिक हैं। इसे गृहयुद्ध के बाद सुप्रीम कोर्ट के ड्रेड स्कॉट फैसले को पलटने के लिए लागू किया गया था, जिसने अफ्रीकी अमेरिकियों को नागरिकता देने से इनकार कर दिया था।
अमेरिका में एच-1बी वीजा धारकों का सबसे बड़ा समूह भारतीयों का है। कई लोग ग्रीन कार्ड मिलने की प्रतीक्षा में वर्षों तक देश में ही रहते हैं। वे अपना करियर बनाते हैं और परिवार पालते हैं। उनके बच्चे अक्सर अमेरिका में ही पैदा होते हैं और मौजूदा कानून के तहत उन्हें नागरिक माना जाता है। सरकार का तर्क उस दीर्घकालिक प्रथा को चुनौती देता है।
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