राष्ट्रपति ट्रंप / REUTERS/Kylie Cooper/File Photo
राष्ट्रपति ट्रंप के दूसरे कार्यकाल से दुनिया की सियासी और सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में हलचल है। खास तौर से उनका दूसरा कार्यकाल भारत-अमेरिका संबंधों में एक अजीब सी कैफियत पैदा कर रहा है। यह कैफियत एक अपना 'महाबली मित्र' होने और एक 'शत्रु का मित्र' होने का ज्वार एक साथ पैदा कर रही है। पश्चिम एशिया प्रकरण में अचानक से पाकिस्तान और विशेष रूप से उसके सेना प्रमुख को अमेरिका ने जिस तरह महत्व दिया है वह भारत के दृष्टिकोण से हैरान करने वाला तो है ही उससे अधिक 'सदमा' पहुंचाने वाला है। और अमेरिका से मिले इस 'आघात' का यह दर्द हडसन इंस्टीट्यूट की 'विचार-गंगा' में भारतीय विचारकों के माध्यम से ही नहीं, वैश्विक घटनाक्रम पर नजर रखने वाले अमेरिकी विद्वानों, पूर्व राजदूत और वक्ताओं की बातों में खुलकर सामने आया।
बेशक, भारत-अमेरिका संबंध एक तनावपूर्ण माहौल से गुजर रहे हैं लेकिन साझा हितों की डोरी ने इन रिश्तों को बांधकर रखा है। साझा हित अमेरिका-भारत के अवाम को भी साफ दृष्टिगत हैं लेकिन राजनीतिक घटनाक्रम ने दोनों देशों की साथ कदमताल के आलोचकों को खुलकर बैटिंग करने का मौका दे दिया है। सियासत का एक बिंदू चीन भी है। जो दृश्य सबको दिखाई दे रहा है उससे अच्छा पाकिस्तान के लिए इससे पहले शायद ही कभी रहा हो। चीन का अंदर से समर्थन और अमेरिका का बाहर से। यह स्थिति भी भारत के लिहाज से चिंताजनक है। राजनीतिक टिप्पणीकार इस स्थिति को भारत के साथ ही अमेरिका के लिहाज से भी अच्छा नहीं मानते क्योंकि इससे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में 'शिफ्ट' को लेकर स्थितियां बनती प्रतीत होने लगती हैं। शिफ्ट यानी भारत का चीन की ओर बढ़ना। भारत के लिहाज से यह रास्ता भी कम पथरीला नहीं है क्योंकि अविश्वास का एक बड़ा पहाड़ बीच में पहले से खड़ा है।
इस स्थिति में राष्ट्रपति ट्रंप के भारत को लेकर दिए बयान भी कम दुविधापूर्ण नहीं हैं। कुछ रोज पहले राष्ट्रपति ने एक वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किया जिसमें कथित रूप से चीन के साथ भारत को भी नर्क बताया गया। भारत ने स्वाभाविक रूप से अपनी प्रतिक्रिया में ट्रंप की टिप्पणियों पर गुस्सा जाहिर किया। लेकिन साथ ही ट्रंप के वे बयान भी दुनिया के सामने हैं जो भारत और भारतीयों के बारे में उनकी अच्छी राय जाहिर करते हैं। भारत के प्रधानमंत्री मोदी से उनकी मित्रता को वे कई बार खुलकर स्वीकार कर चुके हैं। लेकिन मोदी की कई नीतियां उन्हे रास नहीं आतीं, यह बात भी किसी से छिपी नहीं। निसंदेह अमेरिका के सियासी गलियारों में भारत को अच्छा साझीदार बताने वाली आवाजें अधिक हैं लेकिन सत्ता के वर्तमान प्रतिनिधि के 'पल-पल बदलते रंग' दोनों देशों के बीच मित्रता और विश्वास की आधारशिला को चोटिल कर रहे हैं।
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