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'स्वामीनारायण सिद्धांत सुधा' के लिए BAPS के डॉ. भद्रेशदास स्वामी को सरस्वती सम्मान

संस्कृत के विद्वान और BAPS स्वामीनारायण संस्था के प्रमुख महामहोपाध्याय डॉ. भद्रेशदास स्वामी को उनकी पुस्तक 'स्वामीनारायण सिद्धांत सुधा' के लिए 2024 का प्रतिष्ठित सरस्वती सम्मान प्रदान किया गया है। यह सम्मान बीस वर्षों से अधिक समय बाद संस्कृत साहित्य को मिला है। 

BAPS स्वामीनारायण संस्था के प्रमुख महामहोपाध्याय डॉ. भद्रेशदास स्वामी / Courtesy Photo

संस्कृत के प्रख्यात विद्वान और BAPS स्वामीनारायण संस्था के प्रमुख महामहोपाध्याय डॉ. भद्रेशदास स्वामी को 2024 के लिए सरस्वती सम्मान से सम्मानित किया गया है। उनकी किताब स्वामीनारायण सिद्धांत सुधा के लिए उन्हें ये पुरस्कार मिला है। ये सम्मान बीस साल से अधिक समय बाद फिर से संस्कृत साहित्य को मिला है।

के.के. बिरला फाउंडेशन ने 1991 में सरस्वती अवॉर्ड शुरू किया था। ये भारत के सबसे बड़े साहित्यिक सम्मानों में से एक है। हर साल ये अवॉर्ड किसी एक बेहतरीन किताब को मिलता है। किताब सम्मान मिलने के पहले के 10 साल की अवधि के भीतर प्रकाशित होना चाहिए। इसके अलावा किताब भारतीय संविधान में शामिल 22 भाषाओं में से किसी में भी लिखी हो सकती है। 

इस सम्मान के साथ 15 लाख रुपये का इनाम, एक प्रशस्ति पत्र और एक पट्टिका शामिल है। इससे पहले ये सम्मान हरिवंश राय बच्चन, महाश्वेता देवी और एस. एल. भैरप्पा जैसे बड़े-बड़े लेखकों को मिल चुका है। इस साल जस्टिस (रिटायर्ड) अर्जन कुमार सिकरी की अध्यक्षता वाली सरस्वती सम्मान चयन परिषद ने ये फैसला किया है। इसमें कई और बड़े विद्वान भी शामिल थे।

'स्वामीनारायण सिद्धांत सुधा' 2022 में छपी थी। इसमें भगवान स्वामीनारायण के द्वारा बताए गए अक्षर-पुरुषोत्तम दर्शन को समझाया गया है। ये दर्शन वेदांत का एक हिस्सा है। ये किताब पारंपरिक वडाग्रंथ शैली में लिखी गई है। इसमें इस दर्शन की व्याख्या भी है और इसका बचाव भी। लोगों ने इसकी साफ भाषा और प्राचीन दर्शन को आज के जमाने से जोड़ने की बात की खूब तारीफ की है। 

डॉ. भद्रेशदास स्वामी ने BAPS स्वामीनारायण रिसर्च इंस्टिट्यूट के साथ काम करते हुए संस्कृत के क्षेत्र में बहुत बड़ा योगदान दिया है। उनकी 'स्वामीनारायण भाष्य' नाम की पांच खंडों वाली किताब में प्रस्थानत्रयी (उपनिषद, भगवद् गीता और ब्रह्मसूत्र) पर संस्कृत में व्याख्या दी गई है। इससे अक्षर-पुरुषोत्तम दर्शन को स्वतंत्र वेदांत परंपरा के तौर पर और भी मजबूती मिली है। 

भद्रेशदास स्वामी को पहले भी कई बड़े अवॉर्ड मिल चुके हैं। इनमें इंडियन काउंसिल ऑफ फिलॉसॉफिकल रिसर्च (ICPR) का लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड, थाईलैंड की सिल्पकॉर्न यूनिवर्सिटी का वेदांत मार्तंड सम्मान और काविकुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय से महामहोपाध्याय की उपाधि शामिल हैं। उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार ने आचार्य प्रवर की उपाधि से भी सम्मानित किया है। लखनऊ के बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय ने दर्शन शास्त्र में उत्कृष्टता के लिए उन्हें सम्मानित किया। इसके अलावा उन्हें दर्शनकेसरी अवॉर्ड, मैसूर विश्वविद्यालय से प्रोफेसर जी.एम. मेमोरियल अवॉर्ड और श्री सोमनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय से वेदांत प्रकाश और अभिनव भाष्यकार अवॉर्ड भी मिले हैं। 

श्री काशी विद्वत् परिषद ने उन्हें शास्त्रीय संस्कृत व्याख्याकारों की परंपरा में एक आचार्य के रूप में भी मान्यता दी है। उनके पास M.A., Ph.D., D.Litt. और IIT खड़गपुर से मानद D.Sc. की डिग्री है। महंत स्वामी महाराज वर्तमान में आध्यात्मिक गुरु और भगवान स्वामीनारायण के छठे उत्तराधिकारी हैं। वह अपने ज्ञान, विनम्रता और भक्ति से दुनिया भर के भक्तों को प्रेरणा देते रहते हैं।

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