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अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ट्रम्प की व्यापार नीति पर छाए बादल पूरी तरह नहीं छंटे

बीते एक वर्ष में ट्रम्प ने कई बार वैश्विक आर्थिक व्यवस्था को झकझोरा, खासकर “पारस्परिक आयात शुल्क” लागू कर अनेक देशों को नए व्यापार समझौते करने या बातचीत की मेज पर आने को मजबूर किया।

प्रतीकात्मक तस्वीर / IANS File Photo

20 जनवरी 2025 को अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेने के बाद से डोनाल्ड ट्रम्प ने ‘व्यापार’ और ‘आयात शुल्क’ को अपनी नीति का मुख्य हथियार बनाया है। बीते एक वर्ष में उन्होंने कई बार वैश्विक आर्थिक व्यवस्था को झकझोरा, खासकर “पारस्परिक आयात शुल्क” लागू कर अनेक देशों को अमेरिका के साथ नए व्यापार समझौते करने या बातचीत की मेज पर आने को मजबूर किया।

ब्रिटेन के प्रमुख समाचार पत्र ‘द गार्जियन’ ने अपनी टिप्पणी में लिखा कि 2025 में वैश्विक आर्थिक व्यवस्था को बदलने की ट्रम्प की कोशिशों के बाद जापान जैसे देशों को जल्दबाज़ी में अमेरिका से समझौते की दिशा में कदम बढ़ाने पड़े। रिपोर्ट के अनुसार, जापान ने अमेरिकी निर्यात पर कम शुल्क के बदले अमेरिका में निवेश बढ़ाने का वादा किया।

हालांकि 20 फरवरी को अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने 6-3 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए कहा कि ट्रम्प ने अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियां अधिनियम का उपयोग कर वैश्विक आयात शुल्क लगाकर अपने अधिकारों का अतिक्रमण किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह कानून राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी आपात स्थितियों के लिए बनाया गया है, न कि व्यापक व्यापारिक उपायों के लिए। इस निर्णय के साथ ही ट्रम्प द्वारा लगाए गए कई “पारस्परिक आयात शुल्क” निरस्त हो गए।

अपने फैसलों पर आलोचना का तीखा जवाब देने के लिए प्रसिद्ध ट्रम्प ने इसके बाद 10 प्रतिशत का वैश्विक आयात शुल्क घोषित किया, जिसे शीघ्र ही बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया गया। इसके लिए उन्होंने 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 122 का सहारा लिया। हालांकि यह प्रावधान अधिकतम 150 दिनों के लिए अस्थायी शुल्क लगाने की अनुमति देता है और इसे आगे बढ़ाने के लिए अमेरिकी संसद की मंजूरी आवश्यक होती है।

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मध्यावधि चुनाव नजदीक होने के कारण प्रतिनिधि सभा इस मुद्दे पर जल्द मतदान करने से बच सकती है। इस बीच कारोबारियों और व्यापारिक साझेदार देशों के बीच असमंजस की स्थिति बनी हुई है कि वास्तव में कौन-सा आयात शुल्क लागू है, जिससे दीर्घकालिक योजनाएं प्रभावित हो रही हैं।

रिपोर्ट के अनुसार भारत, ब्राजील और चीन को बिना किसी बड़े समझौते के शुल्क में राहत मिली है, जबकि ब्रिटेन जैसे देशों को रियायतें देने के बावजूद अधिक शुल्क का सामना करना पड़ सकता है।

नई दिल्ली ने संभावित व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने से पहले वार्ता को फिलहाल विराम दे दिया है। भारत के निर्यातक, विशेषकर वस्त्र, रसायन और ऑटो कलपुर्ज़ा क्षेत्र से जुड़े कारोबारी, इस अनिश्चितता से चिंतित हैं।

यूरोपीय संघ भी स्थिति को लेकर स्पष्टीकरण मांग रहा है। खबरों के अनुसार ब्रुसेल्स विश्व व्यापार संगठन से परामर्श करने पर विचार कर रहा है और जवाबी कदम उठाने की चेतावनी दे चुका है।

ब्राजील में कृषि निर्यातकों को बढ़ती लागत की चिंता सता रही है। ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा ने हाल ही में दिल्ली दौरे के दौरान देशों से अपील की कि वे अमेरिका के साथ बातचीत के लिए सामूहिक समूह बनाएं।

उधर चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग को आगामी वार्ता में अतिरिक्त बढ़त मिल सकती है, जब 31 मार्च से 2 अप्रैल के बीच बीजिंग में उनकी ट्रम्प के साथ बैठक प्रस्तावित है। चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने कहा है कि वह अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का व्यापक आकलन कर रहा है।

चीन का कहना है कि पारस्परिक आयात शुल्क और फेंटानिल से जुड़े शुल्क जैसे एकतरफा कदम न केवल अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों का उल्लंघन हैं, बल्कि अमेरिका के घरेलू कानूनों के भी विपरीत हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि अब ट्रम्प के लिए चीन पर अमेरिकी सोयाबीन, बोइंग विमान और ऊर्जा उत्पादों की बड़े पैमाने पर खरीद का दबाव बनाना आसान नहीं होगा। वहीं चीन दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति को रणनीतिक रूप से धीमा कर सकता है, जो अमेरिकी उच्च प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित विनिर्माण के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।

कुल मिलाकर, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने ट्रम्प की व्यापार नीति को झटका जरूर दिया है, लेकिन वैश्विक व्यापार में बनी अस्थिरता अभी थमती नहीं दिख रही।

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