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जलवायु संकट के इनोवेटिव समाधान और भारत की अग्रणी भूमिका

उच्चतम ग्रीन हाउस गैस (जीएचजी) उत्सर्जन वाले देशों की सूची में भारत तीसरे स्थान पर है। अमेरिका में जहां प्रति व्यक्ति जीएचजी उत्सर्जन 78,754 KWH और चीन में 31,051 KWH है, वहीं भारत में यह 7,143 KWH ही है।

भारत द्वारा अग्रणी समाधानों का निर्माण कोई आश्चर्य की बात नहीं है। / Image : iStock

(रुचिरा शुक्ला)
 
भारत में वेंचर कैपिटल निवेशक होने के नाते मुझे भारत और विश्व के वीसी इकोसिस्टम को करीब से समझने का मौका मिला है। पिछले डेढ़ दशक में वेंचर कैपिटल इकोसिस्टम के कई चक्र मैंने देखे हैं। जब जब बाजार में उछाल आया है, उसके बाद का समय निवेशकों, संस्थापकों और उनके द्वारा बनाए गए स्टार्टअप्स को दर्द के साथ कठिन सबक देकर गया है। 

हालांकि इन उतार-चढ़ावों के बावजूद भारत का उद्यमशील इकोसिस्टम हर बार और भी मजबूत और परिपक्व होकर निखरा है। बुनियादी तौर पर मजबूत, स्थायी, उच्च गुणवत्ता वाले व्यवसायों को खड़ा करने पर फोकस बढ़ा है। इसके साथ ही, दुनिया की  समस्याओं का समाधान पेश करने और उद्देश्यों को पूरा करने के लिए पहले से कहीं लगन के साथ काम करने की क्षमता में भी सुधार आया है।
 
इस संदर्भ में देखें तो ClimateTech कई अनूठे अवसर पेश करता है। उच्चतम ग्रीन हाउस गैस (जीएचजी) उत्सर्जन वाले देशों की सूची में भारत तीसरे स्थान पर है। हालांकि भारत का प्रति व्यक्ति जीएचजी उत्सर्जन काफी कम है। अमेरिका में जहां प्रति व्यक्ति जीएचजी उत्सर्जन 78,754 KWH और चीन में 31,051 KWH है, वहीं भारत में यह 7,143 KWH ही है। अमेरिका के मुकाबले यह महज 10 फीसदी ही बैठता है।
 
हालांकि आगे भी ऐसा रहेगा, इसमें शक है। भारत का आर्थिक रूप से लगातार मजबूत होना, शहरीकरण में तेज बढ़ोतरी और अधिकांश युवा एवं हाइपर कनेक्टेड आबादी की खर्च करने की क्षमता में बढ़ोतरी उच्च ऊर्जा खपत में भी इजाफा करेगी। भारत जैसे जैसे परिवहन का विद्युतीकृत करेगा, विनिर्माण क्षेत्र का विद्युतीकृत करेगा, डेटा केंद्रों का विस्तार होगा, शहरीकरण में बढ़ोतरी होगी, बिजली का भार तेजी से ग्रिड पर बढ़ेगा। 
 
भारत सरकार जानती है कि ऊर्जा की बढ़ती जरूरतों और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को जीडीपी ग्रोथ से अलग करने की आवश्यकता है। इसी उद्देश्य से सरकार ने 2070 तक राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) को नेट जीरो तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है। भारत देश के विशाल आकार-आबादी और विकास पथ पर लगातार उन्नति को देखते हुए इन उद्देश्यों की प्राप्ति न केवल भारत बल्कि दुनिया के लिए भी महत्वपूर्ण है। वैश्विक आबादी के 17 प्रतिशत से अधिक हिस्से वाले देश को नहीं बचाया गया, तो धरती को बचाना भी संभव नहीं हो सकेगा।
 
इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए बड़ी बडी नवीकरणीय ऊर्जा परियोजना के इतर समाधानों की भी आवश्यकता होगी। हमें ऐसी तकनीकों की जरूरत है जो बड़े पैमाने पर नवीकरणीय ऊर्जा के लिए ग्रिड तैयार कर सकें, अल्पकालिक और दीर्घकालिक भंडारण के लिए बैटरियां बना सकें, ट्रांसमिशन लाइनों की रियल टाइम निगरानी कर पाएं और स्मार्ट मीटर की मदद से एक्टिव लोड में संतुलन बना सकें। 
 
भारत सरकार की रूफटॉप सोलर तकनीक को घर घर तक पहुंचाने की परियोजना हरित गृहों को बढ़ावा देने और लोगों को ऊर्जा खपत के प्रति जागरुक बनाने के लिहाज से अहम है। हालांकि परिसंपत्तियों के समान वितरण, ग्रीन मैन्यूफेक्चरिंग, क्लाइमेट अनुरूप स्मार्ट खेती और कम कार्बन उत्सर्जित करने वाली परिवहन व्यवस्था बनाने के लिए नई तकनीक की जरूरत है। इस दिशा में Synapses भारत के इनोवेशन इकोसिस्टम के साथ मिलकर काम कर रही है। इसका जोर ऐसे समाधानों पर है, जिन्हें भारत ही नहीं विदेशों में भी बेचा जा सके। 
 
भारत द्वारा अग्रणी समाधानों का निर्माण कोई आश्चर्य की बात नहीं है। भारत अपनी प्रौद्योगिकी प्रतिभाओं के लिए प्रसिद्ध है। भारत के 2,500 इंजीनियरिंग कॉलेजों से हर साल 15 लाख इंजीनियर निकलते हैं। अगले दशक में 100 मिलियन से अधिक लोग कामकाजी उम्र के होंगे। इस टेलेंट रिसोर्स का उचित इस्तेमाल करने और इनोवेट करने की इच्छा पिछले तीन दशक में काफी मजबूत हुई है।  
 
भारत में तैयार तकनीक और समाधानों को न सिर्फ भारत में बल्कि विदेशों में भी ग्राहकों, कॉर्पोरेट्स और उपभोक्ताओं द्वारा अपनाया जा रहा है। डेटा, क्लाउड कंप्यूटिंग और एआई जैसी नई प्रौद्योगिकियों में भारत की क्षमताओं को देखते हुए बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने वहां वैश्विक क्षमता केंद्रों (जीसीसी) की स्थापना की है। भारत में इस वक्त लगभग 1,600 जीसीसी हैं, जो वैश्विक नवाचार में भारत की बढ़ती भूमिका को दिखाता है। 

हाल के समय में भारत कम लागत वाले उत्पादों की मैन्यूफैक्चरिंग का बड़ा स्रोत बनकर उभरा है। इसमें कुशल प्रतिभाओं, पूंजी उपलब्धता, प्रौद्योगिकी और डिजिटल क्षमताएं का काफी योगदान है। भारत को विनिर्माण क्षेत्र का चैंपियन बनाने के उद्देश्य से भारत सरकार ने प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) योजना भी लॉन्च की है जो 14 से अधिक क्षेत्रों को 24 बिलियन डॉलर से अधिक का सपोर्ट प्रदान करती है।
 
कॉर्पोरेट क्षेत्र की घरेलू और वैश्विक अगुआ कंपनियां भारत में बड़ी विनिर्माण क्षमताओं का निर्माण कर रही हैं। भारत सरकार का लक्ष्य देश को अगले पांच वर्षों में एक ट्रिलियन डॉलर का इलेक्ट्रॉनिक्स हब बनाना है। टाटा समूह इस मिशन में सबसे आगे है। समूह भारत का पहला सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन प्लांट बनाने के लिए 11 बिलियन डॉलर का निवेश कर रहा है। भारत ने वैश्विक कंपनियों को भी विनिर्माण के लिए आकर्षित किया है। एप्पल अब अपने 14 प्रतिशत उपकरणों का निर्माण भारत में करता है। भारत में सॉफ्टवेयर क्षेत्र पहले से ही परिपक्व है। 

आखिर में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत के अंदर सीमित साधनों से नवाचार करने की मानसिकता गहरे तक पैठ चुकी हैं। भारत ने लंबे समय तक कम संसाधनों में काम किया है। देश में अब बेहतर संसाधन मौजूद हैं और पर्याप्त पूंजी उपलब्ध है, फिर भी किफायत के साथ इनोवेटिव काम करने की संस्कृति कायम है। आर्थिक रूप से रूढ़िवादी होने की यह प्रवृत्ति रचनात्मकता का एक नया स्तर पेश करती है जो कम लागत में बुनियादी समाधान पेश करने को प्रेरित करती है। इसका मतलब ये कि भारत किफायती नवाचार का नया केंद्र बन सकता है।
 
हालांकि जलवायु संकट काफी बड़ा है और इससे निपटने के लिए इनोवेटिव तरीकों की आवश्यकता होगी। कोई भी राष्ट्र अकेले इस समस्या को हल नहीं कर सकता। कोई भी राष्ट्र इसमें पीछे रहना गवारा नहीं कर सकता। भारत ने जिस तरह के अपनी अंदरूनी क्षमता का लाभ उठाया है और विश्वसनीयता हासिल की है, वह पूरी दुनिया में एक अच्छा समाधान प्रदाता बनने की उसकी स्थिति को और मजबूत करती है।

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