सांकेतिक तस्वीर / canva
मेरी अमेरिकी कहानी की शुरुआत डेट्रॉइट पहुंचने से बहुत पहले हो चुकी थी। इसकी शुरुआत भारत के पटना शहर से हुई जब मैं एक स्कूली छात्रा थी और रोज स्कूल जाते समय नेत्रहीन अनाथ बच्चों के एक आश्रम के सामने से गुजरती थी।
उन बच्चों के पास जीवन में अवसर बहुत कम थे और उनकी परिस्थितियों ने मेरे मन पर गहरी छाप छोड़ी। तभी मैंने समझ लिया कि शिक्षा केवल व्यक्तिगत विशेषाधिकार नहीं होती, बल्कि एक जिम्मेदारी भी होती है।
उसी समय मैंने स्वयं से वादा किया कि मैं डॉक्टर बनूंगी और अपने ज्ञान का उपयोग उन लोगों की मदद के लिए करूंगी जिन्हें इलाज के साथ-साथ उम्मीद की भी जरूरत है। यही संकल्प मुझे पटना मेडिकल कॉलेज तक लेकर गया।
वहां मैंने सिर्फ चिकित्सा विज्ञान ही नहीं सीखा बल्कि यह भी सीखा कि एक अच्छा डॉक्टर बनने के लिए केवल वैज्ञानिक ज्ञान पर्याप्त नहीं होता। इसके लिए धैर्य, विनम्रता और हर मरीज को केवल बीमारी नहीं, बल्कि एक इंसान के रूप में देखने की क्षमता भी जरूरी होती है।
अपने प्रशिक्षण के दौरान एक घटना ने मेरे जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया। एक दिन अस्पताल में मैंने एक बुजुर्ग महिला को देखा, जो कभी मेरे परिवार के यहां काम करती थीं। अब उनकी आंखों की रोशनी जा चुकी थी और वे अस्पताल के फर्श पर असहाय बैठी थीं।
जब उन्होंने मेरी आवाज पहचानी तो उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं उनकी आंखों की रोशनी वापस ला सकती हूं। एक नेत्र रोग विशेषज्ञ की मदद से उनका मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराया गया और उनकी आंखों की रोशनी लौट आई।
उनके चेहरे पर जो खुशी थी उसने मुझे जीवनभर के लिए एक सीख दी। करुणा, समय पर इलाज और दृढ़ संकल्प केवल स्वास्थ्य ही नहीं लौटाते बल्कि इंसान का सम्मान भी वापस दिलाते हैं।
जब मैं और मेरे पति 1960 के दशक में अमेरिका आए तब मेरे लिए अमेरिका संभावनाओं की धरती था। मैं अपने साथ चिकित्सा की शिक्षा, मेहनत करने का संस्कार और लोगों की सेवा करने का संकल्प लेकर आई थी।
लेकिन मुझे यह भी पता था कि मुझे अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है। एक नया देश आपको खुद को बदलना सिखाता है। नई संस्कृति को समझना, नए रिश्ते बनाना और अपने पेशे में खुद को साबित करना आसान नहीं होता।
अमेरिका ने मुझे यह सब करने की आजादी दी। इस देश ने मुझे वह अवसर दिया जहां भारत से आई एक महिला डॉक्टर अपनी पढ़ाई आगे बढ़ा सकती थी, अपना करियर बना सकती थी, परिवारों का इलाज कर सकती थी और उद्देश्यपूर्ण जीवन जी सकती थी।
डेट्रॉइट में मैंने चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल से अपनी रेजिडेंसी पूरी की और अपना पूरा करियर बाल रोग (पीडियाट्रिक्स) तथा आपातकालीन चिकित्सा (इमरजेंसी मेडिसिन) को समर्पित कर दिया। मैंने अपने मरीजों और उनके परिवारों को उनके जीवन के सबसे कठिन समय में देखा।
मैंने गरीबी, नशे की समस्या, हिंसा, गंभीर बीमारियों और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी की कमी के दुष्प्रभावों को करीब से महसूस किया। लेकिन मैंने साहस भी देखा।
मैंने ऐसे माता-पिता देखे जिन्होंने अपने बीमार बच्चों के लिए कभी उम्मीद नहीं छोड़ी। ऐसे युवाओं को देखा जिन्होंने अपने जीवन की दिशा बदल दी और ऐसे सामुदायिक लोगों को भी देखा जिन्होंने दूसरों की मदद के लिए हमेशा हाथ बढ़ाया।
इन अनुभवों ने मुझे सिखाया कि स्वास्थ्य केवल अस्पतालों तक सीमित नहीं होता। यह सुरक्षा, शिक्षा, परिवार, आर्थिक अवसर और मजबूत समुदाय से भी जुड़ा होता है।
अमेरिका ने मुझे केवल डॉक्टर बनने का अवसर ही नहीं दिया, बल्कि लोगों को जागरूक करने का मंच भी दिया। धीरे-धीरे मुझे यह महसूस हुआ कि किसी डॉक्टर की जिम्मेदारी मरीज के अस्पताल से बाहर निकलने के बाद खत्म नहीं हो जानी चाहिए।
परिवारों को ऐसी भरोसेमंद और सरल जानकारी मिलनी चाहिए, जिससे वे संकट आने से पहले ही सही फैसले ले सकें। इसी सोच ने मुझे माता-पिता के लिए किताबें और लेख लिखने, सामुदायिक कार्यक्रमों में व्याख्यान देने और ‘हेल्थ टॉक’ नामक एक टेलीविजन कार्यक्रम शुरू करने के लिए प्रेरित किया।
इस कार्यक्रम का उद्देश्य लोगों को स्वास्थ्य संबंधी सही जानकारी देना और चिकित्सा के प्रति जागरूक बनाना था।
इन सभी प्रयासों के माध्यम से मैंने स्वास्थ्य संबंधी जटिल विषयों को आसान भाषा में समझाने की कोशिश की।
मैं लोगों को हमेशा यह याद दिलाना चाहती थी कि रोकथाम, समय पर इलाज और इंसानियत भरा व्यवहार किसी की पूरी जिंदगी बदल सकते हैं।
मैंने यह भी सीखा कि सफलता का असली महत्व तभी है, जब उसे दूसरों के साथ साझा किया जाए। इसी भावना से मैंने अपनी पुस्तक की पूरी आय उस नेत्रहीन अनाथ बच्चों के आश्रम को दान कर दी जिसने बचपन में मुझे डॉक्टर बनने की प्रेरणा दी थी।
मेरे लिए यह केवल एक दान नहीं था। यह मेरी यात्रा की शुरुआत और उसके बाद के सफर को जोड़ने वाला एक भावनात्मक पुल था।
अमेरिका मेरा घर बना। इस देश ने मुझे अपने पेशेवर सपने पूरे करने का अवसर दिया। लेकिन मैंने कभी यह नहीं भुलाया कि मेरे जीवन के मूल मूल्य कहां से आए थे। मेरी भारतीय संस्कृति ने मुझे शिक्षा, परिवार, सेवा और दृढ़ता का महत्व सिखाया।
जबकि मेरे अमेरिकी अनुभव ने मुझे सिखाया कि यही मूल्य स्वतंत्रता, अवसर और मजबूत समुदाय के साथ मिलकर और भी शक्तिशाली बन जाते हैं।
मुझे जीवन में कई सम्मान और पुरस्कार मिले। लेकिन मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार हमेशा मानवीय संबंध रहे हैं।
एक बच्चे का स्वस्थ होकर घर लौटना...
किसी चिंतित माता-पिता का यह महसूस करना कि उनकी बात सुनी गई...
किसी विद्यार्थी का अपने सपनों का पीछा करने के लिए प्रेरित होना...
या किसी परिवार को ऐसी जानकारी मिलना, जो उनके जीवन को सुरक्षित बना दे...
यही वे पल हैं जिन्होंने मुझे हमेशा यह विश्वास दिलाया कि भले ही कोई व्यक्ति दुनिया की हर समस्या हल नहीं कर सकता, लेकिन वह किसी एक इंसान की जिंदगी में सकारात्मक बदलाव जरूर ला सकता है।
मेरी अमेरिकी कहानी केवल एक नए देश में आकर करियर बनाने की कहानी नहीं है। यह मिले हुए अवसरों को सेवा में बदलने की कहानी है।
यह शिक्षा को कर्म में बदलने, स्वतंत्रता को जिम्मेदारी में बदलने और मेहनत को समाज को मजबूत बनाने का माध्यम बनाने की कहानी है।
मैं उस देश की हमेशा आभारी रहूंगी जिसने मुझे एक डॉक्टर, लेखिका, शिक्षिका और समाजसेवी के रूप में आगे बढ़ने का अवसर दिया।
लेकिन सबसे अधिक मैं इस बात के लिए आभारी हूं कि मेरी पूरी यात्रा ने मुझे वह वादा निभाने का अवसर दिया जो मैंने पटना की एक छोटी-सी बच्ची के रूप में स्वयं से किया था - दूसरों की मदद करना ताकि वे अधिक स्वस्थ, अधिक सुरक्षित और अधिक उम्मीद भरी जिंदगी जी सकें।
लेखिका डॉ. नीरू प्रसाद पिछले 30 वर्षों से चिकित्सा क्षेत्र में कार्यरत हैं और बाल रोग (पीडियाट्रिक्स) तथा आपातकालीन चिकित्सा (इमरजेंसी मेडिसिन) की प्रमाणित विशेषज्ञ हैं।
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