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मेघदूत

अपना भारत विवधताओं में जीता है। वहां जीवन से मौसम तक विविध है।

 महाकवि कालिदास की रचना मेघदूत महाकवि कालिदास की रचना मेघदूत / Tapasya Chaubey

अमेरिका में बरसात का कोई मौसम नहीं होता। जब बादल का मन हुआ बरस गया। चाहे भीषण ठंड में बर्फ गिर रही हो या गर्मी से उमसते मरु। बादल अपने मन मुताबिक गरज-बरस लेते हैं। 

अपना भारत विवधताओं में जीता है। वहां जीवन से मौसम तक विविध है। आषाढ़ के आगमन से पहली बारिश की उम्मीद लग जाती है। उमसती धरती और मन ठंडी फुहारों के इंतजार में बादल को निहारते रहते है-निहारते रहते हैं। जन-जीवन मेघ की उम्मीद में बादल का संदेश पढ़ने की कोशिश करते हैं। और इसी वक्त बारिश की फुहारों से मन काव्यतमक हो उठता है। याद कर बैठता है, 'मेघदूत' को। 

यक्ष, अधीर है प्रिय के लिए। प्रिय से मिलन को अभी एक बरस है। एक बरस… ओह! मेघ- धरा के मिलन की बेला पर वह उत्सव कैसे मनाये? कैसे प्रेम के गीत गाए? यक्ष अपनी प्रिय की सौंदर्य की कल्पना कर उसे अपने बाहों में भरने को अधीर है। 

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सोचता है, संभव हो, प्रिय रूठी हो। यह  कल्पना कर यक्ष उसकी तस्वीर चट्टान पर उकेरता है। भाव-विहल होकर खुद को उनके चरणों के नीचे चित्रित करने की कोशिश करता है। लेकिन बार-बार उसकी आंखें भर आती हैं। तस्वीर पूरी नहीं हो पाती। वह समस्त देवों को कोसता है, हे निष्ठुर देव! तुम्हें हमारा मिलन तस्वीरों में भी नहीं सुहाता। 

अपने विरह को जान उसे अपने प्रिय के विरह का भान होता है। वह तड़प उठता है। ऐसे में वह मेघ से अपना संदेश पहुंचाने की विनती करता है और कहता है; हे मेघ! तुम फुहार उड़ाती हुई ठंडी वायु से उसे जगाओगे तो मालती की नई कलियों की तरह वह खिल उठेगी। सुनो, तुम बिजली को अपने भीतर छुपा कर धीरे-धीरे उसके कानों में कहना; प्रिये! तुम्हारी भांति-भांति की कल्पनाओं में मन रमाकर मैं स्वयं को धैर्य देकर जीवन जी रहा हूं। हे मेरी प्रिय! तुम अपने मन का धैर्य मत खोना। संसार में ऐसा कौन है जिसे सदा सुख ही मिला हो और ऐसा कौन है जिसके भाग्य में सदा दुःख ही आया हो? हम सबका भाग्य पहिए की भांति बारी-बारी से ऊपर-नीचे फिरता रहता है।

तुम धीरज धरना मेरी प्राणवायु
ऐसे कथन सुन वह कोमलांगी आंसुओं से नहा उठेगी। ओह मेघ! उस वक्त तुम उसके सामने से हट जाना। तुम्हें क्या मालूम, रात्रि में बिछोह सहनेवाली खंडिता नायिकाओं के आंसू सूर्योदय की बेला में उनके प्रियतम पोंछा करते हैं। प्रियतम से दूर प्रिय के आंसुओं को तुम शीघ्र सूर्य द्वारा पोंछने देना। उनकी गर्माहट में एक क्षण को सही उसे अपने प्रियतम का भान हो। 

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