चार्ली रोज- ग्लोबल कन्वर्सेशन में फरीद जकारिया। / Charlie Rose- Global Conversation
भारतीय-अमेरिकी राजनीतिक कमेंटेटर और पत्रकार फरीद जकारिया ने कहा कि उदारवाद को अपने क्रांतिकारी स्वरूप में लौटने की जरूरत है। सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में, जकारिया ने तर्क दिया कि लोकतांत्रिक समाजवाद और दक्षिणपंथी लोकलुभावनवाद (राइट-विंग पॉपुलिज्म) के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने के लिए उदारवादी विचारधारा को अपने सुधारवादी स्वरूप में लौटना होगा। उन्होंने इसके लिए यूनाइटेड किंगडम और अमेरिका में हाल की राजनीतिक घटनाओं का जिक्र किया।
जकारिया ने इतिहासकार एड्रियन वूलड्रिज की किताब 'द रिवोल्यूशनरी सेंटर' का हवाला दिया और उदारवादियों पर आरोप लगाया कि वे विरासत में मिले विशेषाधिकार, एकाधिकार की शक्ति, सेंसरशिप, कुलीनतंत्र, धार्मिक सत्ता और बंद गिल्ड (व्यापारिक संघों) के विरोध से दूर हो गए हैं। इसके बजाय, वे बड़े विश्वविद्यालयों, फाउंडेशनों, मीडिया संगठनों, कॉरपोरेशनों और हर तरह की नौकरशाही जैसे सत्ता के केंद्रों के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ गए हैं।
उन्होंने आधुनिक उदारवाद पर मुक्त बाजार और मुक्त लोगों को स्वीकार करने का भी आरोप लगाया। उनके अनुसार, इसके कारण बाजार में कॉरपोरेट का दबदबा बढ़ा है और निजी जीवन में कुछ कार्यों को सामाजिक रूप से विनाशकारी मानने में विफलता हुई है; इन दोनों ही नुकसानों को आजादी की कीमत माना गया है।
जकारिया ने उदारवादी पितृवाद (लिबरल पैटरनलिज्म) को फिर से अपनाने के वूलड्रिज के आह्वान का समर्थन किया। उन्होंने तर्क दिया ोकि एक उदारवादी समाज को व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए और साथ ही व्यक्तिगत जिम्मेदारी पर भी जोर देना चाहिए। उन्होंने कहा कि आजादी को न केवल सरकार से, बल्कि एकाधिकार, लत, अज्ञानता और निर्भरता से भी खतरा हो सकता है।
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जकारिया ने कहा कि "शहर की सड़कों पर नशे की लत और मानसिक बीमारी से जूझ रहे लोग डेरा डाले रहते हैं, और लिबरल अक्सर इसे सिर्फ हाउसिंग की समस्या बताते हैं। लाखों लोग मोटापे से जुड़ी बीमारियों से परेशान हैं, और लिबरल उन कंपनियों का सामना करने के बजाय 'फूड डेजर्ट' (जहां ताजा और हेल्दी खाना आसानी से नहीं मिलता) को दोष देना पसंद करते हैं जो ग्राहकों को प्रोसेस्ड फूड की लत लगाती हैं। सोशल मीडिया कंपनियां भी अपने ग्राहकों के ध्यान के साथ ऐसा ही करती हैं।
उन्होंने यह भी साफ किया कि उनकी बातें समाजवाद के पक्ष में नहीं हैं, बल्कि जिसे वे असली लिबरलिज्म कहते हैं, उसके पक्ष में हैं। अपनी बात को साफ करते हुए उन्होंने कहा, कि लिबरल को मार्केट पसंद होना चाहिए, इसलिए नहीं कि वे ताकतवर लोगों को हावी होने या असमानता बढ़ने देते हैं, बल्कि इसलिए कि असली कॉम्पिटिशन छोटे लोगों को ताकतवर लोगों को चुनौती देने का मौका देता है।
जकारिया ने कहा कि दूसरी चुनौती यह है कि मेरिटोक्रेसी (योग्यता-आधारित व्यवस्था) अब एक नए एलीट सिस्टम में बदल गई है। जकारिया का तर्क था कि हालांकि लिबरल संस्थाएं समानता की वकालत करती हैं, लेकिन वे अक्सर विरासत में मिले फायदों को बनाए रखती हैं। ऐसा 'लिगेसी एडमिशन' और नौकरशाही सिस्टम जैसे तरीकों से होता है, जो व्यक्तिगत योग्यता के बजाय ग्रुप की पहचान को प्राथमिकता देते हैं।
उन्होंने K-12 शिक्षा में कमियों की भी आलोचना की। उनका तर्क था कि लिबरल पॉलिटिक्स को बच्चों के बेहतर नतीजों पर ध्यान देना चाहिए और उन संस्थाओं को चुनौती देनी चाहिए जो शैक्षिक सफलता के बजाय अपने हितों को प्राथमिकता देती हैं।
लिबरलिज्म को छोड़ने के बजाय, जकारिया ने इसे नए सिरे से अपनाने की बात कही। उन्होंने लिबरल लोगों से अपील की कि वे एक बार फिर कॉम्पिटिशन, मेरिटोक्रेसी, समान अवसर और मोनोपॉली (एकाधिकार), विरासत में मिले विशेषाधिकार और बंद सिस्टम के विरोध का समर्थन करें।
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