प्रतीकात्मक तस्वीर / AI Generated
अमेरिका में इन दिनों देश की 250वीं वर्षगांठ का आलम है। उत्सव है, उत्साह है और मंथन है। इस लंबी यात्रा की उपलब्धियों का जिक्र और उन पर चर्चाओं का दौर है। और इसी चर्चा में उन प्रवासियों को भी याद किया जा रहा है जो इस यात्रा के किसी कालखंड में या खासकर उत्तरकाल में उपलब्धियों में साक्षी रहे। किसी भी रूप में। ऐसे में स्वाभाविक रूप से भारतीय मूल के उन लोगों को भी याद किया जा रहा है जो देश की महान उपलब्धियों के रचनाकार या भागीदार रहे हैं। इस समय वे भारतवंशी भी गर्वित हैं जो अपनाई हुई धरती पर इतिहास रचने और अपने सपनों को साकार करने में कामयाब रहे। उनके किस्से अनेक संगठन और संस्थाएं तो देश-दुनिया तो बता ही रहे हैं शासन की ओर से भी महान योगदान को सराहा जा रहा है। उसकी शिनाख्त की जा रही है। शिक्षा, चिकित्सा, व्यापार, समाज, श्रम और सत्ता के अलग-अलग क्षेत्रों में ऐसे लोगों के योगदान का मूल्यांकन किया जा रहा है जिससे अमेरिका में महानता का परचम लहरा रहा है।
इसी क्रम में इंडियास्पोरा ने 250 अहम उपलब्धियों का एक डिजिटल कलेक्शन जारी किया। यह कलेक्शन भारतीय-अमेरिकी समुदाय के योगदान का जश्न मनाता है। इस खास कलेक्शन का नाम '250 @ 250: द इंडियन अमेरिकन स्टोरी' है। इसमें 15 से ज्यादा श्रेणियों में भारतीय-अमेरिकी समुदाय की अहम उपलब्धियों को शामिल किया गया है। उद्यमिता, राष्ट्रीय सेवा, विज्ञान और टेक्नोलॉजी, शिक्षा, राजनीति, संस्कृति, चिकित्सा और कला जगत में उनके योगदान की शिनाख्त की गई है। जिस तरह दुनिया के तमाम हिस्सों से लोग अमेरिका का रुख करते हैं उसी तरह कुछ सपने लेकर कुछ लोगों ने अर्सा पहले अमेरिका की धरती पर कदम रखा। मेहनत की और अपनी प्रतिभा के दम पर बड़ा मुकाम हासिल किया। अमेरिकी सपने का साकार करने वाला यह भारतवंशी समूह आज 50 लाख की बड़ी आबादी वाला एक प्रभावशाली समुदाय है। अन्य क्षेत्रों की तरह राजनीति की दुनिया में भी भारतीय मूल के अमेरिकियों की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। स्थानीय चुनाव से लेकर राष्ट्रपति चुनाव तक भारतवंशियों से दम भरा है।
इस बीच अमेरिका को महान बनाने वाली और एक आम इनसान को फर्श से अर्श तक पहुंचाने वाली एक विशिष्टता का जिक्र भारतीय-अमेरिकी बिजनेस कार्यकारी और पेप्सिको की पूर्व चेयरपर्सन और CEO इंदिरा नूयी ने किया है। नूयी ने एक बातचीत में अमेरिका की योग्यता-आधारित (मेरिटोक्रेसी) व्यवस्था की बड़ी तारीफ की है। बकौल नूयी वह दुनिया के किसी भी दूसरे देश में, जिसमें भारत भी शामिल है, कभी CEO नहीं बन पातीं। यह अमेरिका में ही संभव है क्योंकि यहां योग्यता-आधारित व्यवस्था है। यहां कोई आप्रवासी बिना कुछ लिए आ सकता है और अमेरिका की एक मशहूर कंपनी (जिसे 'रेड, व्हाइट और ब्लू' कंपनी कहा जाता है) का CEO बन सकता है। दुनिया के किसी और देश में ऐसा नहीं हो सकता।
बेशक, नूयी की यह बात व्यक्तिगत तौर पर या अपवाद के तौर पर ली जा सकती है लेकिन यह उन हजारों-लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा का सबब भी है जो अपने सपनों को सच करने के लिए अमेरिका की धरती पर कदम रखना चाहते हैं। वर्तमान सत्ता के दौर में भले ही हालात थोड़े जटिल हो गए हों, लेकिन वह सपना जीवित है जिसे 'अमेरिकन ड्रीम' कहते हैं।
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