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आशंका और अपवाद

वे माता-पिता दूसरे देश जाकर अपने बेटे को भले तलाश न कर पाते, लेकिन उस मलाल से तो बच जाते जो अब जीवन भर उनके साथ रहेगा।

 सांकेतिक चित्र। सांकेतिक चित्र। / IANS

इधर, बीते कुछ महीनों से अमेरिका समेत कुछ बड़े देशों में आप्रवासियों के खिलाफ बनने वाले माहौल में उफान आया है। राजनीतिक अभियानों में मुखरता आई है। इसी के नतीजे के रूप में घृणा अपराध भी बढ़े हैं। आप्रवासियों के आगमन और बसने की इच्छाओं को स्थानीय लोग अपने लिए चुनौती मानने लगे हैं। आप्रवास को जीवन और अधिकार की बाधा के रूप में पेश किया जा रहा है। इन हालात को सियासत ने जन्म दिया है और राजनीतिक दल इस स्थिति का अपने-अपने हिसाब से आकलन करके उसका नफा-नुकसान जनता पर 'थोप' रहे हैं। अमेरिका सहित कई देशों ने आव्रजन नियम सख्त कर दिए हैं ताकि इसकी रफ्तार को थामा जा सके। इन हालात में एक घटना काबिलेगौर है जिसका ताल्लुक भारत और फिनलैंड से है। 

हुआ यूं कि फिनलैंड में दक्षिण भारतीय राज्य का एक छात्र दो माह पहले लापता हो गया। उसका शव इसी महीने मिला। जांच-पड़ताल अपनी जगह है लेकिन मौत की खबर आने से पहले उस छात्र के माता-पिता ने अपने बेटे की तलाश के लिए फिनलैंड जाने के वास्ते वीजा आवेदन किया। लेकिन फिनिश अधिकारियों ने उनका वीजा आवेदन इस बिना पर खारिज कर दिया कि वे वहां रहने के दौरान अपने खर्च उठाने के लिए पर्याप्त आर्थिक साधन होने का सबूत नहीं दे पाए। लेकिन बेटे की मौत की खबर पाकर दुखी मां ने मीडिया के सामने वीजा खारिज होने की एक दूसरी ही वजह बताई जो एक मायने में अमानवीय ही कही जा सकती है। मृतक छात्र की मां ने बताया कि उन्हे इस आशंका में वीजा नहीं दिया गया कि कहीं वे आकर फिनलैंड में न बस जाएं। फिनिश अधिकारियों की दलील अपनी जगह सही हो सकती है क्योंकि तरक्कीयाफ्ता देश उसके यहां आने वालों की आर्थिक हैसियत का आकन करते हैं। लेकिन जो बात उस छात्र की मां ने बताई वह बात भी मानवीय होकर ध्यान मांगती है। 

बेशक, आव्रजन के नियम सख्त होते हैं लेकिन हालात भी देखे जाने चाहिए। इस प्रकरण विशेष में साफ है कि वे माता-पिता अपने बेटे की खोज के लिए दूसरे देश जाना चाहते थे। उनका वहां बसने का इरादा कतई नहीं था। यह बात उस दुखी मां ने कही भी। उनका कहना है कि अगर ऐसा भी था तो उन्हे कुछ समय के लिए वीजा दिया जाता। उसकी समय-सीमा तय कर दी जाती। इसके लिए वे लिखित देने के लिए भी तैयार थे। लेकिन शायद नियम-कानूनों में भावनाओं के लिए कोई जगह नहीं होती। फिर भी इनसान के जीवन से बड़ा तो कुछ नहीं। हालात के मद्देनजर अपवाद की गुंजाइश तो रहनी ही चाहिए। वे माता-पिता दूसरे देश जाकर अपने बेटे को भले तलाश न कर पाते, लेकिन उस मलाल से तो बच जाते जो अब जीवन भर उनके साथ रहेगा।

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