मेरी और येल्याना की बातों से इतर इस यूक्रेनियन लड़की ने क्या बेहतरीन फ़िल्म बताई… युद्ध की यातनायें बरसों बाद भी उतनी मारक है…मैं कई दिन इस फ़िल्म के दृश्यों में उलझी रही…इस देखना एक त्रासदी ही हैं…
कुछ पत्रिकाओं में छपने के अलावा लिखने के क्रम में चार किंडल बुक्स प्रकासित की है। खट्टी-मीठी नाम से ब्लॉग लिखा करती हूँ जो अब नियमित नहीं है। इधर कुछ वर्षों से फ़ेसबुक की दुनिया ज़्यादा वृहत हुई। टेक्नोलॉजी और भाषा के मेल से हिन्दी को इसने और विस्तार दिया है।